Skip to main content

Posts

🧼 भारत का Soap बाज़ार : कौन स्वदेशी, कौन विदेशी?

अर्थव्यवस्था, रोजगार और स्वदेशी सोच को समझिए आज हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाला साबुन सिर्फ एक दैनिक उपयोग की वस्तु नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की अर्थव्यवस्था, रोजगार, उद्योग और “स्वदेशी बनाम विदेशी” बहस का भी हिस्सा बन चुका है। बहुत से लोग पूछते हैं “जो साबुन भारत में बन रहा है, क्या वह सच में भारतीय है?” इसका उत्तर थोड़ा गहरा है। कई products भारत में बनते हैं, लेकिन उनकी ownership विदेशी कंपनियों के पास होती है। वहीं कुछ brands पूरी तरह भारतीय कंपनियों द्वारा संचालित हैं। 🇮🇳 स्वदेशी (Indian Ownership) Soap Companies & Brands ये वे brands हैं जिनकी ownership भारतीय कंपनियों या भारतीय समूहों के पास है। 🟢 प्रमुख स्वदेशी Soap Brands 🧼 Medimix Ayurvedic और herbal category का लोकप्रिय भारतीय brand। 🧼 Mysore Sandal Soap चंदन से बनने वाला ऐतिहासिक भारतीय साबुन। Mysore Sandal Soap 🧼 Santoor भारतीय कंपनी का प्रसिद्ध beauty soap brand। Santoor 🧼 Cinthol दशकों पुराना भारतीय soap brand। Cinthol 🧼 Margo Neem आधारित लोकप्रिय भारतीय साबुन। 🧼 Chandrika Ayurvedic soap category का पुर...

CBSE की OSM प्रणाली पर उठते गंभीर सवाल

इस वर्ष 2026 में CBSE 12वीं बोर्ड परीक्षा के परिणामों को लेकर बड़ी संख्या में छात्र और अभिभावक चिंता और असंतोष व्यक्त कर रहे हैं। मामला केवल अंक कम आने का नहीं है, बल्कि पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। विशेष रूप से OSM (On Screen Marking) प्रणाली को लेकर कई आशंकाएँ सामने आ रही हैं। डिजिटल मूल्यांकन व्यवस्था पारदर्शिता और तेजी के उद्देश्य से लागू की गई होगी, लेकिन यदि उसके संचालन और प्रशिक्षण में कमी रह जाए, तो उसका सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ सकता है। जानकारी के अनुसार कई शिक्षकों को OSM प्रणाली की ट्रेनिंग केवल 1-2 दिन ही दी गई। वर्षों से पारंपरिक तरीके से कॉपियाँ जांचने वाले अनेक अनुभवी शिक्षक इतने कम समय में नई डिजिटल प्रणाली को पूरी तरह समझ नहीं पाए होंगे। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मूल्यांकन पूरी सावधानी और तकनीकी दक्षता के साथ हुआ? इसके अलावा PDF scanning प्रक्रिया भी बड़ा मुद्दा बनकर सामने आ रही है। कई स्कूलों में छात्रों को निर्देश दिया गया था कि उत्तरों का sequence maintain रखें और आवश्यकता होने पर बीच में blank/white pages छोड़ें...

नीट परीक्षा या मज़ाक? कब जागेगा NTA और कब समझेगी सरकार?

देश के लाखों छात्र-छात्राएं दिन-रात मेहनत करके NEET जैसी कठिन परीक्षा की तैयारी करते हैं। कोई अपने सपनों के लिए परिवार से दूर रहकर पढ़ता है, कोई आर्थिक तंगी झेलकर कोचिंग करता है, तो कोई अपनी नींद, त्योहार और बचपन तक दांव पर लगा देता है।  लेकिन हर साल एक ही सवाल फिर सामने आ जाता है — क्या मेहनत से ज्यादा ताकत अब “पेपर लीक” की हो गई है? NTA परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षा के नाम पर छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार करती है मानो वे परीक्षार्थी नहीं, अपराधी हों। जूते उतरवाना, बेल्ट निकलवाना, कानों तक की जांच, पानी की बोतल तक पर रोक, घंटों लाइन में खड़ा रखना — हर छोटी चीज़ पर सख्ती दिखाई जाती है।  अभिभावकों को दूर रखा जाता है, बच्चों को मानसिक दबाव में रखा जाता है, और केंद्रों पर नियमों की लंबी सूची थमा दी जाती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इतनी “कड़ी सुरक्षा” होती है तो फिर हर बार पेपर लीक कैसे हो जाता है? क्या ये सुरक्षा सिर्फ ईमानदार छात्रों के लिए है? क्या असली गुनहगारों तक NTA की पहुंच नहीं है? या फिर व्यवस्था में कहीं बहुत बड़ी लापरवाही, मिलीभगत या अक्षमता छिपी हुई है? हर पेपर ली...

राजनगर एक्सटेंशन: टैक्स हमारा, विकास कहीं और?

गाजियाबाद का तेजी से विकसित होता इलाका—राजनगर एक्सटेंशन—आज एक ऐसे विरोधाभास का उदाहरण बन चुका है, जहां निवासी वर्षों से टैक्स तो भर रहे हैं, लेकिन मूलभूत सुविधाओं के लिए अब भी तरस रहे हैं।   करोड़ों का टैक्स, लेकिन हिसाब कहाँ? पिछले एक दशक से अधिक समय से गाजियाबाद नगर निगम लगातार यह तर्क देता आया है कि राजनगर एक्सटेंशन का पूर्ण हस्तांतरण गाजियाबाद विकास प्राधिकरण से नहीं हुआ है, इसलिए वह यहां विकास कार्य करने में असमर्थ है। लेकिन सवाल यह है— 👉 जब हस्तांतरण नहीं हुआ, तो टैक्स किस आधार पर वसूला गया? 👉 करोड़ों रुपए का हाउस टैक्स आखिर किस क्षेत्र में खर्च हुआ? 👉 क्या इस क्षेत्र के निवासी केवल “रेवेन्यू जनरेटर” बनकर रह गए हैं? 🚧 मूलभूत सुविधाओं का अभाव राजनगर एक्सटेंशन की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है ❌ सड़कों की हालत बद से बदतर ❌ नियमित सफाई व्यवस्था का अभाव ❌ हरित पट्टी, पार्क और डिवाइडर पर पेड़-पौधों की कमी ❌ सार्वजनिक सुविधाएं जैसे डिस्पेंसरी, डाकघर, कम्युनिटी हॉल नदारद क्या यही है “स्मार्ट सिटी” की परिकल्पना? 🏪 विकास या व्यावसायिक लालसा? सूत्रों के अनुसार, नगर निगम अब इस क्षेत्...

राजनगर एक्सटेंशन में IFMS का पैसा: सवाल अब आंदोलन बन रहा है

राजनगर एक्सटेंशन — ऊँची इमारतें, बड़े-बड़े वादे, और एक सपना… लेकिन आज उसी सपने के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा है: 👉 “हमारा IFMS का पैसा आखिर गया कहाँ?” यह कोई सामान्य शिकायत नहीं है। यह हजारों परिवारों की मेहनत की कमाई है, जिसे बिल्डर ने मेंटेनेंस सिक्योरिटी के नाम पर लिया — और आज तक उसका स्पष्ट हिसाब नहीं दिया गया। IFMS: भरोसे का पैसा या बंद कमरे का खेल? जब फ्लैट खरीदा गया, तब IFMS (Interest Free Maintenance Security) के नाम पर मोटी रकम ली गई। कहा गया — “यह पैसा सोसायटी के हित में सुरक्षित रहेगा” लेकिन आज स्थिति क्या है? हैंडओवर के बाद भी पैसा AOA को नहीं मिला कोई पारदर्शी अकाउंट स्टेटमेंट नहीं बिल्डर और AOA के बीच जिम्मेदारी टालने का खेल निवासियों के सवालों पर चुप्पी या गोलमोल जवाब 👉 क्या यही पारदर्शिता है? 👉 क्या यही विश्वास था जिसके आधार पर लोगों ने घर खरीदा?  अब सवाल तीखे होंगे राजनगर एक्सटेंशन के निवासी अब सीधे सवाल पूछ रहे हैं: IFMS का पूरा पैसा किस खाते में है? क्या यह पैसा कहीं और इस्तेमाल किया गया? अगर सुरक्षित है, तो AOA को ट्रांसफर क्यों नहीं हुआ? प्रशासन और RERA इस पर खाम...

राजनगर एक्सटेंशन की सड़कों का दर्द – आखिर कब जागेगा प्रशासन?

राजनगर एक्सटेंशन… एक ऐसा क्षेत्र, जहाँ हजारों परिवार अपने सपनों का घर लेकर आए थे। लेकिन आज वही सपना टूटी सड़कों, बिखरे कूड़े और लापरवाही के बोझ तले दबता जा रहा है। हाल ही में सामने आई खबरें भी यही बताती हैं कि यहाँ की सड़कें वर्षों से बदहाल हैं और लोग लगातार परेशान हो रहे हैं। क्या यही विकास है? क्या हमारे जनप्रतिनिधि बताएंगे—क्या गड्ढों से भरी सड़कें ही विकास की पहचान हैं? क्या सड़क पर फैला कूड़ा हमारी व्यवस्था की सच्चाई नहीं दिखाता? क्या हजारों परिवारों की रोज़मर्रा की परेशानी किसी की प्राथमिकता नहीं है? जब हर चुनाव में “विकास” के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, तो फिर राजनगर एक्सटेंशन की सड़कों की यह हालत क्यों? कूड़ा क्या बताता है? सड़क पर पड़ा कूड़ा सिर्फ गंदगी नहीं है, यह बताता है— व्यवस्था की लापरवाही सफाई तंत्र की विफलता और जिम्मेदारों की चुप्पी जहाँ कूड़ा बिखरा हो, वहाँ बीमारी, बदबू और असुविधा अपने आप आ जाती है। क्या यही माहौल हम अपने बच्चों के लिए चाहते हैं? जनप्रतिनिधियों से सीधे सवाल वार्ड मेंबर जी, क्या आपने कभी इन सड़कों पर चलकर देखा है? विधायक जी, क्या आपको पता है कि रोज़ ल...

राजनगर एक्सटेंशन की सच्चाई: विकास के दावों के बीच टूटती सड़कें और बिखरती उम्मीदें

तेजी से बढ़ते शहरों के बीच Rajnagar Extension को कभी एक उभरते हुए आधुनिक क्षेत्र के रूप में देखा गया था। ऊँची-ऊँची सोसाइटियाँ, नए घरों के सपने और बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर हजारों परिवार यहाँ आए। लेकिन आज, जब हम इस इलाके की जमीनी हकीकत देखते हैं, तो तस्वीर उम्मीदों से बिल्कुल उलट नजर आती है। 🚧 सड़कें नहीं, संघर्ष का रास्ता राजनगर एक्सटेंशन की सड़कों की हालत आज बेहद चिंताजनक है। जगह-जगह गड्ढे, टूटी हुई सड़कें और उन पर भरा पानी—यह सिर्फ एक असुविधा नहीं बल्कि रोज़ का संघर्ष बन चुका है। बच्चों के स्कूल जाने से लेकर बुजुर्गों के टहलने तक, हर कदम पर खतरा महसूस होता है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए तो यह रास्ता किसी परीक्षा से कम नहीं। 🗑️ कूड़े के ढेर में घुटती ज़िंदगी सिर्फ सड़कें ही नहीं, बल्कि साफ-सफाई की स्थिति भी बेहद खराब है। जगह-जगह कूड़े के ढेर, बदबू और गंदगी इस क्षेत्र की पहचान बनते जा रहे हैं। सुबह की ताज़गी अब दुर्गंध में बदल गई है। यह न केवल देखने में खराब लगता है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है—बढ़ती बीमारियों का कारण बनता हुआ। ❓ जिम्मेदारी किसकी? जब Ghaziabad Development ...