देश के लाखों छात्र-छात्राएं दिन-रात मेहनत करके NEET जैसी कठिन परीक्षा की तैयारी करते हैं। कोई अपने सपनों के लिए परिवार से दूर रहकर पढ़ता है, कोई आर्थिक तंगी झेलकर कोचिंग करता है, तो कोई अपनी नींद, त्योहार और बचपन तक दांव पर लगा देता है।
लेकिन हर साल एक ही सवाल फिर सामने आ जाता है — क्या मेहनत से ज्यादा ताकत अब “पेपर लीक” की हो गई है?
NTA परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षा के नाम पर छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार करती है मानो वे परीक्षार्थी नहीं, अपराधी हों।
जूते उतरवाना, बेल्ट निकलवाना, कानों तक की जांच, पानी की बोतल तक पर रोक, घंटों लाइन में खड़ा रखना — हर छोटी चीज़ पर सख्ती दिखाई जाती है।
अभिभावकों को दूर रखा जाता है, बच्चों को मानसिक दबाव में रखा जाता है, और केंद्रों पर नियमों की लंबी सूची थमा दी जाती है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इतनी “कड़ी सुरक्षा” होती है तो फिर हर बार पेपर लीक कैसे हो जाता है?
क्या ये सुरक्षा सिर्फ ईमानदार छात्रों के लिए है?
क्या असली गुनहगारों तक NTA की पहुंच नहीं है?
या फिर व्यवस्था में कहीं बहुत बड़ी लापरवाही, मिलीभगत या अक्षमता छिपी हुई है?
हर पेपर लीक के बाद वही बयान आते हैं —
“जांच होगी”,
“दोषियों पर कार्रवाई होगी”,
“भविष्य में ऐसा नहीं होगा।”
लेकिन भविष्य हर साल फिर वैसा ही क्यों हो जाता है?
सरकार और NTA को समझना होगा कि यह सिर्फ एक परीक्षा नहीं, करोड़ों परिवारों के सपनों और भरोसे का सवाल है। जब पेपर लीक होता है तो सिर्फ प्रश्नपत्र बाहर नहीं जाता, बल्कि लाखों मेहनती छात्रों का मनोबल टूटता है। ईमानदारी हारती है और सिस्टम पर से विश्वास खत्म होता है।
अब समय आ गया है कि केवल छात्रों पर सख्ती करने के बजाय सिस्टम के अंदर बैठे दोषियों पर सबसे कठोर कार्रवाई हो।
यदि किसी परीक्षा का पेपर लीक होता है तो उसकी नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। बड़े अधिकारियों तक जवाबदेही पहुंचनी चाहिए। तकनीकी सुरक्षा, डिजिटल निगरानी और पारदर्शिता को केवल कागजों में नहीं, जमीन पर लागू करना होगा।
देश के युवा अब सिर्फ आश्वासन नहीं चाहते, उन्हें निष्पक्ष परीक्षा चाहिए।
क्योंकि मेहनत करने वाले बच्चों का धैर्य अब जवाब देने लगा है।
बहुत हो गया अब।
NEET जैसी परीक्षाओं को मज़ाक बनने से रोकना ही होगा।
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